जागरण टुडे। ज्येष्ठ मास के पावन पर्व गंगा दशहरा और निर्जला एकादशी इस वर्ष विशेष धार्मिक महत्व के साथ मनाए जाएंगे। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार 24 जून को गंगा दशहरा तथा 25 जून को निर्जला एकादशी का पर्व श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाएगा। उच्च राशि में स्थित बृहस्पति के प्रभाव से इन दोनों पर्वों का महत्व और अधिक बढ़ गया है।
यह जानकारी श्री दीपक ज्योतिष भागवत संस्थान के निदेशक ज्योतिषाचार्य पंडित कामेश्वर नाथ चतुर्वेदी ने गोपाल गली स्थित संस्थान के कैंप कार्यालय में आयोजित विद्वत गोष्ठी में दी। उन्होंने बताया कि गंगा दशहरा के दिन गंगा स्नान, दान-पुण्य, जप-तप और पूजा-अर्चना करने से दस प्रकार के पापों का नाश होता है। शास्त्रों में इन्हें कायिक, वाचिक और मानसिक पापों की श्रेणी में रखा गया है।
उन्होंने कहा कि गंगा दशहरा का पर्व मां गंगा के पृथ्वी पर अवतरण की स्मृति में मनाया जाता है। इस दिन श्रद्धालु पवित्र नदियों में स्नान कर पुण्य अर्जित करते हैं तथा जरूरतमंदों को दान देकर धार्मिक कर्तव्यों का पालन करते हैं।
गोष्ठी में आचार्य ब्रजेन्द्र नागर ने बताया कि ज्येष्ठ शुक्ल दशमी के दिन मां गंगा का पृथ्वी पर आगमन हुआ था। गंगा का उद्गम उत्तराखंड के गंगोत्री हिमनद से माना जाता है, जहां इसे भागीरथी के नाम से जाना जाता है। देवप्रयाग में अलकनंदा और भागीरथी के संगम के बाद यह गंगा कहलाती है। उन्होंने कहा कि मोक्षदायिनी गंगा का स्नान और पूजन करने से जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्ति मिलने की मान्यता है।
ज्योतिषाचार्य पंडित दीपक चतुर्वेदी और पंकज चतुर्वेदी ने बताया कि पौराणिक कथाओं के अनुसार राजा भागीरथ ने कठोर तपस्या कर मां गंगा को पृथ्वी पर अवतरित कराया था, ताकि राजा सगर के पुत्रों को मोक्ष प्राप्त हो सके। इसी कारण गंगा को पतित पावनी और मोक्षदायिनी कहा जाता है।
विद्वानों ने बताया कि 25 जून को पड़ने वाली निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन विधि-विधान से व्रत रखने वाला साधक वर्ष भर की सभी एकादशियों का पुण्य फल प्राप्त करता है। इस व्रत में जल तक ग्रहण नहीं किया जाता, इसलिए इसे निर्जला एकादशी कहा जाता है।
रामदास चतुर्वेदी शास्त्री और सौरभ शास्त्री ने कहा कि निर्जला एकादशी पर जल, वस्त्र, छाता, फल तथा मीठे जल का दान करने का विशेष महत्व है। इससे परिवार में सुख, समृद्धि, ऐश्वर्य और मंगल की वृद्धि होती है। उन्होंने श्रद्धालुओं से अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान-पुण्य करने का आह्वान किया।
गोष्ठी में आचार्य मुरलीधर चतुर्वेदी, मनोज पाठक, मनीष पाठक, ऋषभ देव, गोविंद देव, निरंजन शास्त्री और प्रियांशु सहित अनेक विद्वानों ने गंगा दशहरा एवं निर्जला एकादशी के धार्मिक, आध्यात्मिक और सामाजिक महत्व पर विचार व्यक्त किए।