निविदा प्रकाशन प्रक्रिया पर भी उठे सवाल, सभासदों ने राजस्व परिषद में की शिकायत
जागरण टुडे, कासगंज(उदित विजयवर्गीय)
नगर पालिका परिषद गंजडुण्डवारा द्वारा कादरगंज रोड स्थित भूमि पर 41 दुकानों के निर्माण के लिए जारी ई-निविदा अब लगातार विवादों में घिरती जा रही है। पहले भूमि को तालाब और जलमग्न बताकर सभासदों ने राजस्व परिषद लखनऊ में शिकायत दर्ज कराई, वहीं अब निविदा प्रकाशन प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल उठने लगे हैं। आरोप है कि निविदा सूचना ऐसे समाचार पत्रों में प्रकाशित कराई गई जो कस्बे में नियमित रूप से आते ही नहीं हैं, जिससे आम लोगों और संभावित आपत्तिकर्ताओं को इसकी जानकारी न मिल सके।
पालिका परिषद ने कादरगंज रोड स्थित स्थल पर 8, 10, 11 और 12 दुकानों सहित कुल 41 दुकानों के निर्माण के लिए निविदाएं आमंत्रित की हैं। निर्माण कार्य की अनुमानित लागत एक करोड़ रुपये से अधिक बताई जा रही है। निविदा जमा करने की अंतिम तिथि 30 मई निर्धारित की गई है।
तालाब की जमीन पर निर्माण का आरोप
वार्ड 17 के सभासद कृष्ण कुमार सिंह, वार्ड 10 की सभासद रेखा गुप्ता, सभासद लुबना शाहीन और मुदस्सिर ने संयुक्त रूप से राजस्व परिषद लखनऊ को शिकायत भेजकर पूरी निविदा प्रक्रिया निरस्त करने की मांग की है। शिकायत में कहा गया है कि गाटा संख्या 766/0.533 हेक्टेयर भूमि राजस्व अभिलेखों में तालाब और जलमग्न दर्ज है। ऐसे में उस पर व्यावसायिक दुकानों का निर्माण कराना नियमों के विपरीत है।
सभासदों ने आरोप लगाया कि यदि तालाब क्षेत्र में स्थायी निर्माण हुआ तो कादरगंज रोड और आसपास के मोहल्लों की जल निकासी व्यवस्था पूरी तरह प्रभावित हो जाएगी। उनका कहना है कि वर्तमान में भी बरसात के दौरान क्षेत्र में जलभराव की समस्या बनी रहती है और प्रस्तावित निर्माण स्थल पर पानी निकासी का कोई वैकल्पिक साधन नहीं है। ऐसे में दुकानों के निर्माण से बारिश का पानी रुक सकता है और आसपास के मोहल्लों में गंभीर जलभराव की स्थिति पैदा हो सकती है।
“यह तालाब नहीं, पंजावा की जमीन” — ईओ
मामले में नगर पालिका परिषद के अधिशासी अधिकारी सुनील कुमार ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि संबंधित भूमि तालाब की नहीं बल्कि “पंजावा” की जमीन है। उन्होंने कहा कि निविदा प्रक्रिया पूरी तरह नियमानुसार कराई गई है।
अब निविदा प्रकाशन पर उठे सवाल
विवाद के बीच अब निविदा प्रकाशन प्रक्रिया भी चर्चा में आ गई है। विरोध करने वाले सभासदों और स्थानीय लोगों का आरोप है कि निविदा सूचना ऐसे समाचार पत्रों में प्रकाशित कराई गई जो कस्बे में नियमित रूप से वितरित ही नहीं होते। आरोप है कि ऐसा जानबूझकर किया गया ताकि स्थानीय लोगों को समय रहते जानकारी न मिल सके और कोई प्रभावी आपत्ति दर्ज न हो पाए।
स्थानीय लोगों का कहना है कि करोड़ों रुपये की सार्वजनिक परियोजना से जुड़ी निविदा का व्यापक प्रचार-प्रसार होना चाहिए था, लेकिन सीमित प्रसार वाले समाचार पत्रों में प्रकाशन कराकर प्रक्रिया को औपचारिकता तक सीमित रखा गया। इसे लेकर अब पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं।
राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में बढ़ी हलचल
मामले ने अब राजनीतिक रंग भी पकड़ लिया है। एक पक्ष इसे नगर पालिका की राजस्व बढ़ाने की योजना बता रहा है, जबकि विरोधी पक्ष इसे तालाब और सार्वजनिक हित के खिलाफ निर्णय करार दे रहा है। वहीं जल निकासी, पर्यावरणीय प्रभाव और निविदा प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर उठे सवालों ने प्रशासनिक हलकों में भी हलचल बढ़ा दी है। अब निगाहें जिला प्रशासन और राजस्व परिषद की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं।