फतेहगंज पश्चिमी (बरेली) क्षेत्र के गाँव खिरका जगतपुर में आयोजित संगीतमय साप्ताहिक श्रीरामकथा ज्ञानयज्ञ के छठे दिन श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा का अद्भुत संगम देखने को मिला। नैमिष धाम से पधारे प्रसिद्ध कथाव्यास आचार्य अवध किशोर शास्त्री ‘सरस’ जी ने अपने ओजस्वी प्रवचनों से श्रद्धालुओं को सनातन धर्म के गूढ़ सिद्धांतों से अवगत कराया। कथा पांडाल में भारी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं ने भक्ति रस में डूबकर प्रभु श्रीराम के आदर्शों को आत्मसात किया।
कथाव्यास ने अपने प्रवचन में कर्म के अटल सिद्धांत पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मनुष्य को अपने प्रत्येक कर्म का फल अवश्य भोगना पड़ता है। उन्होंने राजा दशरथ और श्रवण कुमार की मार्मिक कथा का वर्णन करते हुए बताया कि किस प्रकार एक भूल के कारण दशरथ को जीवन के अंतिम समय में पुत्र वियोग का असहनीय दुख सहना पड़ा। यह प्रसंग यह सिखाता है कि जीवन में सदैव सत्कर्मों का पालन करना चाहिए, क्योंकि कर्मों से मुक्ति संभव नहीं है।
आचार्य ‘सरस’ जी ने श्रीराम, लक्ष्मण और माता सीता के वनगमन प्रसंग को भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि जब भरत को वनवास का समाचार मिला, तो वे पिता की मृत्यु के दुख को भी भूलकर श्रीराम के प्रति अपनी अटूट भक्ति में लीन हो गए। भरत का त्याग और धर्मनिष्ठा सनातन संस्कृति का अनुपम उदाहरण है। उन्होंने सिंहासन स्वीकार करने से स्पष्ट इंकार करते हुए अपने भ्राता के प्रति समर्पण का अद्वितीय आदर्श प्रस्तुत किया।
कथाव्यास ने भरत-राम मिलन के प्रसंग को अत्यंत भावुकता के साथ सुनाया और बताया कि भरत ने श्रंगवेरपुर तक पैदल यात्रा की और आगे भूमि पर लेट-लेटकर प्रभु के प्रति अपनी भक्ति प्रकट की। इस दौरान उन्होंने यह भी कहा कि सच्चे भक्त के प्रति भगवान सदैव कृपालु रहते हैं, लेकिन भक्त का अपमान करने वाला व्यक्ति स्वयं ही अपने विनाश का कारण बनता है।
कार्यक्रम का आयोजन मटरूलाल- लालीदेवी मेमोरियल चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में सूबेदार मेजर वीरेंद्र पाल सिंह के संयोजकत्व में किया जा रहा है। इसमें ग्रामवासियों का सराहनीय सहयोग मिल रहा है। कथा के दोनों सत्रों में बड़ी संख्या में महिला-पुरुष श्रद्धालु उपस्थित रहे।
रविवार को हवन-पूजन एवं विशाल भंडारे के साथ इस पावन श्रीरामकथा का समापन होगा, जिसकी तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं।