अनवर खांन
जागरण टूडे, सहावर।
देश में लागू किए गए आपातकाल (25 जून 1975 से 21 मार्च 1977) की 51वीं बरसी पर लोकतंत्र सेनानी एवं लोकतंत्र सेनानी कल्याण परिषद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. इस्लाम अहमद फारूकी ने उस दौर की यादों को साझा करते हुए कहा कि इमरजेंसी भारतीय लोकतंत्र का सबसे काला अध्याय था। उन्होंने कहा कि उस समय पूरे देश को जेलखाने में बदल दिया गया था और लोकतांत्रिक अधिकारों का खुलकर दमन किया गया।
डॉ. फारूकी ने बताया कि 25-26 जून 1975 की मध्यरात्रि में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सरकार द्वारा देश में आपातकाल लागू किया गया। इसके बाद विपक्षी नेताओं और लोकतंत्र समर्थकों की बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हुईं। उन्होंने कहा कि 7 जुलाई 1975 को सहावर पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर एटा जिला जेल भेज दिया था। उन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने अपने संबोधन में तानाशाही के खिलाफ आवाज उठाई थी। बाद में 30 मई 1976 को एटा की अदालत ने उन्हें छह माह के सश्रम कारावास की सजा सुनाई।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र सेनानियों के संघर्ष और बलिदान के कारण ही देश में लोकतंत्र की पुनर्स्थापना संभव हो सकी। जनवरी 1977 में आम चुनावों की घोषणा हुई और मार्च में हुए चुनाव में कांग्रेस की पराजय के बाद आपातकाल समाप्त हो गया।
डॉ. फारूकी ने बताया कि वर्ष 2006 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने सभी राजनीतिक दलों के आपातकाल बंदियों को "लोकतंत्र सेनानी" का सम्मान देते हुए मानदेय एवं अन्य सुविधाएं प्रदान की थीं। वर्तमान में उत्तर प्रदेश सरकार लोकतंत्र सेनानियों को 20 हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय दे रही है।
उन्होंने कहा कि कासगंज जनपद में अब 13 लोकतंत्र सेनानी या उनके आश्रित शेष हैं। लोकतंत्र सेनानियों का सम्मान लोकतंत्र का सम्मान है। केंद्र सरकार को भी इनके योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता देनी चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां लोकतंत्र की रक्षा के लिए प्रेरित हो सकें।