ज्यादा रघुराय मत बनो... यह महज एक जुमला नहीं, बल्कि भारतीय फोटोग्राफी के उस शिखर पुरुष के प्रति आम आदमी का अनचाहा सम्मान था। जिनका नाम ही इस फन की पहचान बन गया था। आज जब दुनिया के महानतम फोटोग्राफरों में शुमार रघुराय के निधन की खबर आई, तो बरेली की गलियों से लेकर प्रेस क्लब तक शोक में डूब गया।
बरेली के वरिष्ठ छायाकारों का कहना है कि अगर आप कैमरें वाले है, तो आपको उनसे मिलना ही चाहिए था। उस दौर में हर आदमी का इंप्रेशन एक ही होता था रघुराय। उस दौर में उनके साथ बहुत सारे लोग अच्छा काम कर रहे थे, लेकिन रघुराय के अपने डेडीकेशन ने उन्हें जो फेम दिया था वो फेम भी लोगों को प्रभावित करता था, उनके काम के अलावा।
वर्ष 1986 में उनकी किताब ताजमहल आई। ताजमहल किताब 800 रुपए थी। उस समय लीडिंग अखबारों में फोटोग्राफरों का वेतन 700-800 रुपये होता था। फिर भी रघुराय की किताब खरीदते थे। आज की पब्लिक सिनेमा वाले कलाकारों से प्रभावित हो रही हैं। मगर कैमरे वाले लोगों के इंप्रेशन एक ही, वो रघुराय थे। उनके बड़े भाई भी फोटोग्राफर थे, जो बहुत खूबसूरत काम कर रहे थे, लेकिन रघुराय का मतलब रघुराय ही थे।
वरिष्ठ छायाकार मोहम्मद खालिद खान ने बताया कि रघुराय फोटोग्राफी के लिए जीते थे। इसका प्रमाण उनकी तस्वीरों में साफ तौर पर झलकता है। वह ऐसे एंगल से फोटो खींचते थे, जिसे लोग देखते ही रह जाते थे। रघुराय का कहना था कि फोटो देखकर देखने वाले के मुंह से वाह न निकले, तो उस फोटो का कोई मतलब नहीं होता। उनके काम के लिए उनको पदम श्री सम्मान मिला। उनके चले जाने से अखबार का एक हिस्सा चला गया।