Sunday, April 19, 2026

KASGANJ NEWS वक्त की मार: अपना घर होते हुए भी वृद्धाश्रम में थमा जीवन, अब अकेली रह गई जीवनसंगिनी, बेटा और बहु ने शव लेने से किया इंकार

लेखक: Guddu Yadav | Category: उत्तर प्रदेश | Published: April 15, 2026

KASGANJ NEWS वक्त की मार: अपना घर होते हुए भी वृद्धाश्रम में थमा जीवन, अब अकेली रह गई जीवनसंगिनी, बेटा और बहु ने शव लेने से किया इंकार

जागरण टुडे, गुड्डू यादश, कासगंज।

कहते हैं कि समय से बड़ा कोई नहीं होता—और जब वही विपरीत हो जाए, तो इंसान बेबस होकर रह जाता है। ऐसा ही एक मार्मिक मामला सामने आया, जहां जीवन भर का साथ निभाने वाला एक दंपती अपने ही घर से दूर, वृद्धाश्रम में आकर ठहर गया, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था—यह साथ भी अंततः अधूरा रह गया।

70 वर्षीय चंद्र प्रकाश और उनकी 74 वर्षीय पत्नी धनदेवी ने 30 मार्च को सहावर गेट स्थित नई हवेली वृद्धाश्रम में शरण ली थी। चंद्र प्रकाश लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे और उनका उपचार भी जारी था। आर्थिक तंगी और जीवन की कठिनाइयों ने उन्हें इस मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया था कि उन्हें अपने ही घर से दूर रहना पड़ा।



14 अप्रैल की शाम, चंद्र प्रकाश ने वृद्धाश्रम में अपनी अंतिम सांस ली। जीवन के इस अंतिम पड़ाव पर उनकी पत्नी धनदेवी उनके साथ थीं, लेकिन उनके जीवन का यह सफर, जो कभी अपने घर से शुरू हुआ था, वृद्धाश्रम में आकर अधूरा रह गया।

दंपती के नाम ततारपुर स्थित कांशीराम आवासीय कॉलोनी में एक मकान आवंटित था, लेकिन वहां उनका बेटा रहता है, जो खुद आर्थिक रूप से सक्षम नहीं है और कोई स्थायी काम भी नहीं करता। परिवार की स्थिति इतनी दयनीय हो चुकी थी कि धनदेवी को बिलराम गेट पर एक हलवाई की दुकान में काम करना पड़ता था। जो थोड़ा-बहुत मिलता, उसी से दोनों का गुजारा चलता था। हालात इतने बिगड़ गए कि दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल हो गया।

इसी मजबूरी में दंपती ने वृद्धाश्रम का सहारा लिया। अपनी व्यथा सुनाने के बाद उन्हें वहां आश्रय मिल गया। चंद्र प्रकाश के निधन के बाद आश्रम प्रशासन ने उनके बेटे और बेटी को सूचना दी। दोनों मौके पर पहुंचे, लेकिन बेटे की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी ‘मानव संस्कार सेवा समिति’ ने निभाई। अंतिम संस्कार पूरे विधि-विधान से कराया गया और शांति पाठ भी वृद्धाश्रम में आयोजित किया जाएगा।

वृद्धाश्रम की वार्डन योग्यता कुमारी ने बताया कि यहां इस समय 84 बुजुर्ग रह रहे हैं, जिनमें से कई की कहानियां ऐसी ही दर्द और संघर्ष से भरी हैं।

अब धनदेवी अकेली रह गई हैं। उनका कहना है कि वे अब वृद्धाश्रम को ही अपना घर मान चुकी हैं और यहीं जीवन के शेष दिन बिताना चाहती हैं। यह घटना समाज के सामने कई सवाल खड़े करती है—क्या बुजुर्गों का सहारा केवल वक्त के भरोसे ही रह गया है?

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