एजेंसी, नई दिल्ली। दुनिया भर में बच्चों पर डिजिटल प्रभाव और पढ़ाई में गिरते ध्यान को लेकर बढ़ती चिंता के बीच अब कई देशों ने स्कूलों में मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर सख्ती बढ़ा दी है। यूनेस्को की वैश्विक शिक्षा निगरानी (GEM) टीम की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, अब दुनिया के आधे से अधिक देशों में स्कूलों के भीतर मोबाइल फोन पर किसी न किसी रूप में प्रतिबंध लागू है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्तमान में 114 शिक्षा प्रणालियों में राष्ट्रीय स्तर पर मोबाइल फोन के उपयोग पर रोक है, जो वैश्विक स्तर पर लगभग 58 प्रतिशत देशों का प्रतिनिधित्व करता है। यह आंकड़ा पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है। वर्ष 2023 में जहां यह संख्या 24 प्रतिशत से भी कम थी, वहीं 2025 की शुरुआत तक यह करीब 40 प्रतिशत तक पहुंच गई और अब 2026 में इसमें और बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
विशेषज्ञों के अनुसार, स्कूलों में मोबाइल पर पाबंदी लगाने का मुख्य कारण छात्रों का पढ़ाई में ध्यान भटकना और ऑनलाइन माध्यम से होने वाली साइबरबुलिंग है। इसके अलावा सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव को भी एक बड़ी चिंता के रूप में देखा जा रहा है। रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे इंस्टाग्राम और टिकटॉक किशोरों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर असर डाल रहे हैं।
एक अध्ययन के मुताबिक, इंस्टाग्राम के उपयोग के बाद 32 प्रतिशत किशोरियों में अपने शरीर को लेकर असंतोष की भावना बढ़ जाती है। वहीं टिकटॉक का एल्गोरिदम किशोरों को बार-बार शारीरिक छवि और खानपान से जुड़ी सामग्री दिखाता है, जिससे खान-पान संबंधी विकारों का खतरा बढ़ सकता है। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि लड़कियों में ऐसे विकारों की संभावना लड़कों के मुकाबले लगभग दोगुनी है।
हालांकि, सभी देश पूर्ण प्रतिबंध के पक्ष में नहीं हैं। कुछ देशों ने सख्त रोक के बजाय सीमित उपयोग की नीति अपनाई है। उदाहरण के तौर पर फ्रांस में प्राथमिक स्तर पर मोबाइल के उपयोग पर रोक है, लेकिन उच्च स्तर पर इसे लेकर अभी भी बहस जारी है।
कई देशों ने हाल ही में स्कूलों को दिशा-निर्देश जारी कर मोबाइल उपयोग को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी दी है। इनमें कोलंबिया, एस्टोनिया, इंडोनेशिया और फिलीपींस जैसे देश शामिल हैं। वहीं संयुक्त राज्य अमेरिका में राष्ट्रीय स्तर पर कोई एकसमान नीति नहीं है, लेकिन 39 राज्यों में स्कूलों के लिए मोबाइल उपयोग को लेकर नियम लागू किए गए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में यह बहस और तेज होगी, क्योंकि सरकारें बच्चों की पढ़ाई, मानसिक स्वास्थ्य और डिजिटल उपयोग के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही हैं।