गुड़गांव से दून घाटी तक ‘भुवनेश्वर दर भुवनेश्वर’ में अभिनय के लिए मिले सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के पुरस्कार, शाहजहांपुर की रंगमंचीय विरासत से जुड़ी है यह रंगयात्रा
वर्तमान संसार में जो कुछ भी अस्तित्व में है, उसके पीछे कोई न कोई प्रेरणा अवश्य है। सृष्टि के रचनाकार ने पृथ्वी को जिस रंगमंच के रूप में सजाया है, उस पर प्रत्येक मनुष्य अपनी भूमिका निभा रहा है। सूर्य का ताप, चांदनी की शीतलता, तारों का संसार, वनस्पतियां, समुद्र और पहाड़ प्रकृति के इस विराट मंच के अलग-अलग दृश्य हैं। जीवन और रंगमंच के इसी संबंध को समझने की कोशिश शाहजहांपुर की सांस्कृतिक परंपरा में भी दिखाई देती है। इसी परंपरा से जुड़े रंगकर्मी महेश सक्सेना ने हिंदी के विलक्षण नाटककार भुवनेश्वर के जीवन और साहित्य को रंगमंच के माध्यम से नई पहचान दिलाने का प्रयास किया।
शहीदों की नगरी शाहजहांपुर स्वतंत्रता संग्राम की गौरवशाली विरासत के साथ साहित्य और सांस्कृतिक जागृति की भूमि भी रही है। काकोरी कांड के अमर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां और ठाकुर रोशन सिंह के बलिदान ने इस शहर को राष्ट्रीय पहचान दिलाई। इन क्रांतिकारियों की विरासत में सांप्रदायिक सौहार्द और कौमी एकता का संदेश भी समाहित है। इसी ऐतिहासिक और सामाजिक परिवेश ने शहर की साहित्यिक तथा रंगमंचीय गतिविधियों को भी प्रभावित किया।
भुवनेश्वर के साहित्य ने तोड़ीं नाटक की पुरानी दीवारें
हिंदी साहित्य में भुवनेश्वर का नाम उन रचनाकारों में लिया जाता है, जिन्होंने नाटक की परंपरागत शैली से अलग अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। असंगत नाटक की परंपरा के शुरुआती और महत्वपूर्ण रचनाकारों में शामिल भुवनेश्वर की भाषा, शिल्प और संवाद शैली उन्हें विशिष्ट बनाती है। उनकी रचनाओं में स्थापित मान्यताओं को चुनौती देने और अभिव्यक्ति के नए रास्ते तलाशने की प्रवृत्ति दिखाई देती है।
उनकी चर्चित रचनाओं में 'भेड़िये', 'तांबे के कीड़े', 'श्यामा : एक वैवाहिक विडंबना' और 'स्ट्राइक' का उल्लेख किया जाता है। इन रचनाओं के माध्यम से भुवनेश्वर ने हिंदी साहित्य और नाट्य जगत में अपनी अलग पहचान बनाई। इसके बावजूद उनके जीवन और साहित्य को अपेक्षित लोकप्रियता नहीं मिल सकी। अपने ही शहर से संबंध रखने वाले इस युगांतरकारी साहित्यकार का जीवन लंबे समय तक गुमनामी में रहा।
‘अंधायुग’ के मंचन के बाद शुरू हुई भुवनेश्वर की खोज
महेश सक्सेना के अनुसार, वर्ष 1990 में डॉ. धर्मवीर भारती के काव्य नाटक 'अंधायुग' का निर्देशन जबलपुर के वी. देवलिया ने गांधी भवन में किया था। इस मंचन के बाद हुई मुलाकात ने उनके जीवन की रंगयात्रा को एक नई दिशा दी।
नौ नाटकों के मंचन के बाद देवलिया उनके निवास पर पहुंचे। उस समय उनके मित्र राजकुमार शर्मा भी मौजूद थे। बातचीत के दौरान देवलिया ने कहा कि जब वे लोग रंगमंच के विकास के लिए पूरी मेहनत कर रहे हैं, तो उन्हें अपने ही शहर के नाटककार भुवनेश्वर पर शोध क्यों नहीं करना चाहिए। महेश सक्सेना ने उनसे पूछा कि इस शोध से क्या हासिल होगा। इस पर देवलिया ने विश्वास जताया कि एक दिन लोग भुवनेश्वर के साहित्यिक योगदान को पहचानेंगे और महेश सक्सेना की रंगयात्रा को याद करेंगे।
इस बातचीत ने सक्सेना को गहराई से प्रभावित किया। इसके बाद उन्होंने राजकुमार शर्मा के साथ मिलकर भुवनेश्वर के जीवन और साहित्य पर काम शुरू किया। करीब चार-पांच महीने तक दोनों ने दिन-रात मेहनत की। इस दौरान भुवनेश्वर के सगे-संबंधियों से बातचीत और साक्षात्कार के माध्यम से उनके जीवन से जुड़ी जानकारियां जुटाई गईं। इस प्रयास ने भुवनेश्वर के व्यक्तित्व और रचनात्मक संसार को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
‘भुवनेश्वर दर भुवनेश्वर’ में निभाई मुख्य भूमिका
भुवनेश्वर के जीवन और साहित्य से जुड़ाव आगे चलकर महेश सक्सेना के अभिनय का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। वर्ष 2006 में चंद्रमोहन महेंद्रू ने उनसे संपर्क किया। भुवनेश्वर से उनके गहरे जुड़ाव को देखते हुए उन्होंने मीराकांत द्वारा लिखित नाटक 'भुवनेश्वर दर भुवनेश्वर' में भुवनेश्वर की भूमिका निभाने का प्रस्ताव दिया।
सक्सेना ने इस भूमिका को स्वीकार कर लिया। इसके बाद नाटक का पूर्वाभ्यास शुरू हुआ। उनके लिए यह केवल एक पात्र को निभाने का अवसर नहीं था, बल्कि उस साहित्यकार के जीवन और मानसिक संसार को समझने की चुनौती भी थी, जिसकी प्रतिभा के बावजूद उसे जीवन में वह पहचान नहीं मिल सकी, जिसका वह हकदार था।
महेश सक्सेना ने इस भूमिका को पूरी गंभीरता और मेहनत से तैयार किया। उन्होंने भुवनेश्वर के व्यक्तित्व को मंच पर जीवंत करने के लिए विशेष प्रयास किए। उनकी मेहनत रंग लाई और इस नाटक ने उनके रंगकर्म को एक अलग पहचान दिलाई।
गुड़गांव से दून घाटी तक मिले सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के पुरस्कार
'भुवनेश्वर दर भुवनेश्वर' में अभिनय के लिए महेश सक्सेना को अलग-अलग शहरों में आयोजित नाट्य आयोजनों में सम्मान मिला। वर्ष 2006 में गुड़गांव, वर्ष 2008 में वाराणसी और धामपुर तथा वर्ष 2009 में पौड़ी गढ़वाल और दून घाटी में इस नाटक के मंचन के दौरान उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के पुरस्कार मिलने की जानकारी उन्होंने साझा की।
गुड़गांव में मिला सम्मान उनके लिए खास अनुभव बन गया। आयोजन से जुड़े प्रमुख भसीन ने पुरस्कार देते समय उनके अभिनय की सराहना की। सक्सेना के मुताबिक, उन्होंने कहा कि नाटक में भुवनेश्वर के रूप में उनकी पहली एंट्री के समय दर्शक ठिठक गए थे और सभागार में सन्नाटा छा गया था। निर्णायकों की भी राय थी कि उनके अभिनय ने पूरे नाटक पर गहरी छाप छोड़ी।
भसीन ने यह भी कहा कि सक्सेना के अभिनय ने भुवनेश्वर के चरित्र को अमर कर दिया। यह टिप्पणी महेश सक्सेना के लिए केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं थी, बल्कि उस साहित्यकार को मंच के माध्यम से याद करने का अवसर भी थी, जिसे अपने जीवनकाल में पर्याप्त पहचान नहीं मिल सकी।
तालियों के लिए तरसते रहे भुवनेश्वर, आज मंच पर मिल रहा सम्मान
पुरस्कार प्राप्त करने के बाद अपने संबोधन में महेश सक्सेना ने भुवनेश्वर के जीवन की विडंबना को सामने रखा। उन्होंने कहा कि विलक्षण प्रतिभा के धनी भुवनेश्वर गुमनामी के अंधेरे में खो गए। आज उनके पात्र को मंच पर निभाने वाले अभिनेता को तालियां मिल रही हैं, जबकि वास्तविक भुवनेश्वर जीवन भर इसी पहचान और सराहना के लिए तरसते रहे। उनकी यह टिप्पणी रंगमंच और साहित्य के बीच मौजूद उस गहरे संबंध को रेखांकित करती है, जिसमें एक कलाकार अपने अभिनय के माध्यम से किसी भूले-बिसरे रचनाकार को नई पीढ़ी के सामने ला सकता है।
महेश सक्सेना की यह रंगयात्रा केवल पुरस्कारों और मंचीय उपलब्धियों की कहानी नहीं है। यह शाहजहांपुर की साहित्यिक विरासत को पहचान दिलाने और हिंदी नाट्य जगत के महत्वपूर्ण रचनाकार भुवनेश्वर को स्मृतियों में जीवित रखने का प्रयास भी है। जीवन और नाटक के रिश्ते को समझने की इसी कोशिश में यह विचार सार्थक दिखाई देता है कि नाटक को जीवन की तरह और जीवन को नाटक की तरह जिया जाए।