1996 में हारमोनियम वादन से शुरू हुआ सफर, भजनों और दृश्यों में संगीत के जरिए मंचन को बनाते हैं प्रभावशाली
प्रभु श्रीराम के प्रति आस्था और समर्पण जब सेवा का रूप ले लेता है, तो वर्षों तक व्यक्ति को एक ही उद्देश्य से जोड़े रखता है। फैक्ट्री स्टेट श्रीरामलीला में संगीत के माध्यम से अपनी सेवाएं दे रहे जलालनगर निवासी राम लखन राठौर की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। करीब तीन दशक से रामलीला मंचन से जुड़े राम लखन राठौर के लिए संगीत केवल एक कला नहीं, बल्कि प्रभु श्रीराम की सेवा का माध्यम है। हारमोनियम वादन से शुरू हुआ उनका सफर आज भी उसी श्रद्धा और समर्पण के साथ जारी है।
राम लखन राठौर ने वर्ष 1996 में हारमोनियम वादक के रूप में फैक्ट्री स्टेट श्रीरामलीला मंचन से जुड़कर अपनी सेवाएं शुरू की थीं। वर्ष 2001 तक उन्होंने लगातार रामलीला में संगीत की जिम्मेदारी निभाई। इसके बाद कुछ निजी कारणों के चलते वह मंचन को समय नहीं दे सके। हालांकि, प्रभु श्रीराम के प्रति उनकी आस्था बनी रही और वर्ष 2018 में उन्हें एक बार फिर रामलीला मंचन में सेवा करने का अवसर मिला। इसके बाद से वह निरंतर अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।
भजनों की मधुरता से दृश्यों में भरते हैं भाव
रामलीला मंचन में संगीत की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। भजनों की मधुर धुन जहां वातावरण को भक्तिमय बनाती है, वहीं प्रसंग के अनुरूप संगीत कथा के भावों को दर्शकों तक पहुंचाने में मदद करता है। राम लखन राठौर इसी भूमिका को बखूबी निभाते हैं। वह भजनों को अपने संगीत से मधुरता प्रदान करने के साथ ही मंच पर प्रस्तुत होने वाले दृश्यों के अनुरूप धुनें तैयार करने में भी योगदान देते हैं।
रामलीला में प्रसंग के अनुसार संगीत का संयोजन मंचन की प्रभावशीलता को बढ़ाता है। भावपूर्ण दृश्यों में संगीत कथा के प्रभाव को गहरा करता है, जिससे दर्शक पात्रों के भाव और घटनाक्रम से भावनात्मक रूप से जुड़ पाते हैं। राम लखन राठौर का प्रयास रहता है कि संगीत के माध्यम से मंच पर प्रस्तुत प्रसंगों की अनुभूति और अधिक प्रभावी बने।
आस्था और परिवार के बीच निभा रहे जिम्मेदारी
जलालनगर निवासी राम लखन राठौर के परिवार में उनकी पत्नी, दो बेटे और तीन बेटियां हैं। पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ रामलीला में संगीत सेवा के लिए समय निकालना उनके जीवन का अहम हिस्सा है। उनके लिए फैक्ट्री स्टेट श्रीरामलीला से जुड़ाव केवल मंचन के दौरान निभाई जाने वाली जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रभु श्रीराम के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करने का अवसर है।
वर्षों के इस जुड़ाव में समय के साथ परिस्थितियां बदलीं, लेकिन राम लखन राठौर की आस्था और संगीत के प्रति लगाव बना रहा। वर्ष 1996 में शुरू हुआ उनका सफर बीच में कुछ समय के लिए जरूर थमा, लेकिन वर्ष 2018 में दोबारा शुरू होने के बाद लगातार आगे बढ़ रहा है। रामलीला के मंच पर संगीत के जरिए अपनी भूमिका निभाते हुए वह धार्मिक परंपरा को जीवंत बनाए रखने में योगदान दे रहे हैं।