सतीश सक्सेना ने बाल कलाकार के रूप में शुरू किया सफर, 1991 में बने थे निर्देशक
महानगर की ऐतिहासिक फैक्ट्री स्टेट श्रीरामलीला मंच से सतीश सक्सेना का जुड़ाव पांच दशक से अधिक पुराना है। वर्ष 1972 में बाल कलाकार के रूप में शुरू हुआ उनका सफर आज भी जारी है। अभिनय से लेकर निर्देशन और मंच संचालन तक उन्होंने रामलीला की परंपरा को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है। वर्ष 1985 से 2004 तक लगातार प्रभु श्रीराम के अनुज लक्ष्मण का किरदार निभाकर उन्होंने दर्शकों के बीच अपनी अलग पहचान बनाई। अब सक्रिय अभिनय से दूर होने के बावजूद वह मंच संचालन के माध्यम से रामलीला से जुड़े हुए हैं।
बाल कलाकार से शुरू हुआ अभिनय का सफर
सतीश सक्सेना ने वर्ष 1972 में फैक्ट्री स्टेट श्रीरामलीला मंच से जुड़कर अपने सफर की शुरुआत की थी। शुरुआती दौर में उन्होंने बाल कलाकार के रूप में मंच पर अभिनय किया। वर्ष 1977 में पहली बार उन्हें शाखा बसंत की भूमिका निभाने का अवसर मिला। इसके बाद उन्होंने कामदेव, शत्रुघ्न और शिव-शंकर सहित कई महत्वपूर्ण किरदारों को मंच पर जीवंत किया।
अलग-अलग भूमिकाओं में अभिनय करते हुए उन्होंने मंच की बारीकियां सीखीं। इसी दौरान उन्हें लक्ष्मण की भूमिका निभाने की सलाह मिली। सतीश सक्सेना बताते हैं कि कामदेव का किरदार निभाने के दौरान ही उनसे लक्ष्मण की भूमिका की तैयारी करने को कहा गया था। इसके करीब छह वर्ष बाद वर्ष 1985 में उन्हें यह अवसर मिला।
19 साल तक निभाया लक्ष्मण का किरदार
वर्ष 1985 में लक्ष्मण की भूमिका मिलने के बाद सतीश सक्सेना ने वर्ष 2004 तक लगातार इस किरदार का मंचन किया। करीब 19 वर्षों तक उन्होंने अपने अभिनय से दर्शकों के बीच लक्ष्मण की छवि को जीवंत रखा। प्रभु श्रीराम के प्रति समर्पण, भाई के रूप में लक्ष्मण का स्नेह और अन्य प्रसंगों में उनके संवादों को सतीश सक्सेना ने अपने अभिनय के जरिए प्रस्तुत किया।
उनका कहना है कि लक्ष्मण के किरदार के संवाद और उससे जुड़े भाव आज भी उनके हृदय में जीवित हैं। इस भूमिका ने उन्हें जो पहचान और सम्मान दिलाया, वह उनके लिए जीवन की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में शामिल है।
1991 में संभाली निर्देशक की जिम्मेदारी
अभिनय के साथ-साथ सतीश सक्सेना को वर्ष 1991 में रामलीला के निर्देशक का दायित्व भी सौंपा गया। इस भूमिका में उन्होंने मंचन की तैयारियों और प्रस्तुतियों से जुड़ी जिम्मेदारियां निभाईं। अभिनय और निर्देशन के अनुभव ने रामलीला मंच से उनके जुड़ाव को और मजबूत किया।
वर्ष 2004 के बाद उन्होंने सक्रिय अभिनय छोड़ दिया, लेकिन रामलीला से उनका रिश्ता नहीं टूटा। वह आज भी मंच संचालक के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। उनके लिए मंच संचालन केवल कार्यक्रम को आगे बढ़ाने का माध्यम नहीं, बल्कि उस परंपरा से जुड़े रहने का जरिया है, जिसने उन्हें जीवनभर मान-सम्मान और पहचान दी।
वरिष्ठ कलाकारों के साथ साझा किया मंच
सतीश सक्सेना ने रामलीला के अपने लंबे सफर में ओमकार द्विवेदी, महेश श्रीवास्तव, ओमदेव मिश्रा और श्रीनाथ यादव जैसे वरिष्ठ कलाकारों के साथ मंच साझा किया। इन कलाकारों के साथ काम करते हुए उन्हें अभिनय और मंचन के कई अनुभव मिले। उनका सफर फैक्ट्री स्टेट श्रीरामलीला की उस परंपरा का भी परिचय देता है, जिसमें पीढ़ियों से कलाकार धार्मिक प्रसंगों को मंच के माध्यम से लोगों तक पहुंचाते रहे हैं।
सेवानिवृत्ति के बाद भी रामलीला से जुड़ाव
वर्ष 1985 में सतीश सक्सेना निर्माणी विभाग में कार्यरत हुए थे। नौकरी के साथ-साथ उन्होंने रामलीला मंच के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाई और वर्ष 2021 में सेवानिवृत्त हुए। हालांकि, नौकरी से सेवानिवृत्ति के बाद भी रामलीला से उनका जुड़ाव बरकरार है।
सतीश सक्सेना का कहना है कि फैक्ट्री स्टेट श्रीरामलीला मंच उनके लिए केवल अभिनय करने की जगह नहीं है, बल्कि आध्यात्मिक सुख, मान-सम्मान और जीवन की सबसे बड़ी पहचान है। वह कहते हैं कि जब तक शरीर में प्राण हैं, तब तक श्रीरामलीला मंच की सेवा करते रहेंगे। पांच दशक से अधिक समय से जारी उनका यह सफर रामलीला के प्रति समर्पण और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ाव की मिसाल है।सतीश सक्सेना,