उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में आयोजित ओसीएफ श्रीरामलीला मंचन में बुधवार को राम वनगमन के बाद अयोध्या में राजा दशरथ के प्राण त्यागने, भरत के चित्रकूट पहुंचकर श्रीराम से अयोध्या लौटने का आग्रह करने और जयंत प्रसंग का भावपूर्ण मंचन किया गया। कलाकारों ने अपने सजीव अभिनय से दर्शकों को रामायण के इन मार्मिक प्रसंगों से जोड़ दिया। भरत का भ्रातृप्रेम, राजा दशरथ का पुत्र वियोग और माता सीता के प्रति श्रीराम की रक्षा भावना मंचन के प्रमुख आकर्षण रहे।
भरत ने चरण पादुकाएं लेकर अयोध्या लौटने का किया निर्णय
मंचन का शुभारंभ श्रीरामलीला एवं प्रदर्शनी के सचिव बलवीर सिंह और आवंटन समिति के विश्वनाथ विश्व ने भगवान के स्वरूपों की आरती उतारकर किया। इसके बाद रामायण के प्रसंगों का मंचन शुरू हुआ।
मंचन में दिखाया गया कि सुमंत के अयोध्या लौटने पर राजा दशरथ उनसे श्रीराम, लक्ष्मण और माता सीता के बारे में जानकारी लेते हैं। वन से पुत्रों के वापस न आने के दुख में राजा दशरथ व्याकुल हो जाते हैं और अंततः पुत्र वियोग में अपने प्राण त्याग देते हैं। इसके बाद गुरु वशिष्ठ भरत और शत्रुघ्न को उनके ननिहाल से अयोध्या बुलवाते हैं।
अयोध्या पहुंचने पर भरत को जब श्रीराम के वनवास की पूरी घटना का पता चलता है तो वह गहरे दुख में डूब जाते हैं। वह माता कौशल्या, कैकेयी, सुमित्रा, गुरु वशिष्ठ और अन्य लोगों के साथ श्रीराम को मनाने चित्रकूट पहुंचते हैं। भरत श्रीराम से अयोध्या लौटकर राजपाट संभालने का आग्रह करते हैं, लेकिन पिता के वचन का पालन करने के लिए श्रीराम वनवास पूरा करने के अपने संकल्प पर अडिग रहते हैं। इसके बाद भरत श्रीराम की चरण पादुकाएं लेकर अयोध्या लौटने का निर्णय लेते हैं।
जयंत प्रसंग और माता अनुसुइया के उपदेश का हुआ मंचन
इसके बाद जयंत प्रसंग का मंचन किया गया। इसमें दिखाया गया कि जयंत कौवे का रूप धारण कर माता सीता को चोट पहुंचाता है। इससे क्रोधित होकर श्रीराम उस पर बाण चलाते हैं। जयंत अपनी रक्षा के लिए देवताओं के पास जाता है, लेकिन कहीं से सहायता नहीं मिलती। अंततः वह श्रीराम की शरण में पहुंचकर क्षमा मांगता है। प्रभु उसे दंड देने के बाद जीवनदान देते हैं।
इसके बाद श्रीराम, लक्ष्मण और माता सीता चित्रकूट से आगे बढ़कर अत्रि मुनि के आश्रम पहुंचते हैं। यहां माता अनुसुइया, सीता को वस्त्र और आभूषण भेंट करती हैं तथा उन्हें पतिव्रत धर्म का उपदेश देती हैं। इन प्रसंगों के माध्यम से मर्यादा, त्याग, भक्ति, कर्तव्य और पारिवारिक मूल्यों का संदेश दिया गया।
कलाकारों ने निभाए विभिन्न पात्र
बुधवार के मंचन में राम की भूमिका मोहित बाजपेई, लक्ष्मण की अमित श्रीवास्तव, भरत की पारस दीक्षित, शत्रुघ्न की रोहित सक्सेना, सुमंत की कौशलेंद्र पांडे और राजा दशरथ की पैट्रिक दास ने निभाई। कौशल्या की भूमिका अनन्या, सुमित्रा की लक्ष्मी, कैकेयी की अनामिका और गुरु वशिष्ठ की भूमिका संदीप आर्य ने निभाई।
इसी तरह निषादराज के रूप में ईश्वरदीन, जनक के रूप में सुहेल, जयंत के रूप में विजय राणा, कागराज के रूप में बटेश्वर, ब्रह्मा के रूप में मनोज, शिव के रूप में अंकित अवस्थी, नारद के रूप में सुमित राणा और माता अनुसुइया के रूप में रजनी अग्निहोत्री ने अभिनय किया। विषाद के पात्र में बटेश्वर सहित पीयूष राणा, सौरभ मोहन, अर्जुन, अरविंद, सूर्यांश और एलेक्स समेत अन्य कलाकारों ने भी विभिन्न भूमिकाएं निभाकर मंचन को जीवंत बनाया।
मंचन को सफल बनाने में मंचन सचिव एके व्यास, देवेश दीक्षित, निर्देशक अंकित सक्सेना, सहायक निर्देशक सुहेल मोहम्मद, प्रभारी महेंद्र दीक्षित, सुरक्षा पर्यवेक्षक राममोहन अग्निहोत्री, व्यवस्थापक प्रदीप अग्निहोत्री, कार्यालय से अखिलेश सक्सेना और विपिन शर्मा, मंचन मीडिया प्रभारी रोहित सक्सेना और वरिष्ठ रंगकर्मी एवं मंच संचालक सतीश सक्सेना सहित अन्य लोगों का सहयोग रहा।