अब बरेली में भी पेड़ों पर अंगूर के गुच्छे लटकते दिखाई देंगे। महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखंड विश्वविद्यालय के कृषि एवं प्रौद्योगिकी संकाय ने परिसर में अंगूर की खेती शुरू करने का निर्णय लिया है। इस पहल का उद्देश्य छात्रों को व्यवहारिक शिक्षा देना और क्षेत्रीय किसानों को आधुनिक बागवानी से जोड़ना है।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने प्रयोग के तौर पर विभिन्न देशों से अंगूर की उन्नत प्रजातियों की पौध मंगाने की तैयारी की है। इन किस्मों का परीक्षण कर यह देखा जाएगा कि रुहेलखंड की जलवायु और मिट्टी के अनुरूप कौन सी प्रजाति बेहतर उत्पादन देती है। शोधार्थियों में विदेशी किस्मों को लेकर खासा उत्साह देखा जा रहा है।
पादप विज्ञान विभाग के प्रो. उपेंद्र वालियान के अनुसार, कैंपस में डिजिटल लर्निंग हब और इंटरनेशनल ट्रांजिट छात्रावास के बीच खाली पड़ी भूमि को मॉडल बगीचे के रूप में विकसित किया जा रहा है। यह बगीचा भविष्य में ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ के रूप में कार्य करेगा। यहां कृषि संकाय के छात्र अंगूर की प्रूनिंग, ट्रेलिस सिस्टम (पंडाल विधि) और उन्नत प्रबंधन तकनीकों का व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त करेंगे।
इस परियोजना का लाभ केवल छात्रों तक सीमित नहीं रहेगा। विश्वविद्यालय परिसर में विकसित नर्सरी से उत्तम गुणवत्ता की पौध स्थानीय किसानों को उपलब्ध कराई जाएगी। इससे किसान पारंपरिक गेहूं-धान की खेती से हटकर नकदी फसल की ओर अग्रसर हो सकेंगे और उनकी आय में वृद्धि होगी। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि बरेली और आसपास के क्षेत्रों की मिट्टी अंगूर उत्पादन के लिए उपयुक्त है, बशर्ते सही तकनीक और देखरेख अपनाई जाए।
इस परियोजना में बिथरी चैनपुर के तिगरा गांव के प्रगतिशील किसान अनिल साहनी का मार्गदर्शन भी लिया जाएगा। अनिल साहनी पिछले कुछ वर्षों से करीब 10 एकड़ में अंगूर की सफल खेती कर रहे हैं। उनके अनुभव का लाभ अब विश्वविद्यालय के छात्र और शोधार्थी उठा सकेंगे।