वृंदावन शोध संस्थान द्वारा आयोजित आठ दिवसीय सांझी महोत्सव के अंतर्गत चल रहे सांझी संवाद के समापन पर श्रीहित हरिवंश महाप्रभु की जन्मस्थली बाद ग्राम में पुष्प, रंग, तथा जल सांझी प्रस्तुतिकरण के साथ ही रसोपासना में सांझी का स्वरूप शीर्षक संगोष्ठी, समाज गायन एवं वृक्षारोपण आदि कार्यक्रम संपन्न हुए।
संगोष्ठी के दौरान विधायक श्रीकांत शर्मा ने कहा कि वृंदावन शोध संस्थान द्वारा ब्रज की सांझी परंपरा के संरक्षण एवं संवर्द्धन की दिशा में उल्लेखनीय कार्य किए जा रहे हैं। ब्रज की परंपरागत कला सांझी को बचाने तथा संरक्षण के लिए नई पीढ़ी के आगे आने की आवश्यकता है। डॉ. चंद्रप्रकाश शर्मा ने बताया कि सांझी में कला, संगीत और साहित्य का अद्भुत समन्वय है। वाणी साहित्य के अंतर्गत सांझी के संदर्भ प्रचुरता से सुलभ होते हैं।
आचार्य सुकृतलाल गोस्वामी ने कहा कि वृंदावनी उपासना में सांझी का महत्वपूर्ण स्थान है। यह पर्यावरण से जुड़ा हुआ उत्सव है। इसमें वन-वृंदावन में सहज प्राप्त होने वाली सामग्री का प्रयोग होता है। महंत लाड़िलीशरण महाराज के द्वारा आशीवर्चन व्यक्त किए गए।
इससे पूर्व कार्यक्रम का शुभारंभ समाज गायन से हुआ। पुष्प सांझी अंतर्गत अष्ट सखी मंडल में राजभोग सेवा, रंग सांझी में मानिनी राधा एवं जल सांझी में श्रीहित हरिवंश महाप्रभु का प्रस्तुतिकरण गिरीश पाठक ने किया। कार्यक्रम का समन्वय एवं संचालन डॉ. राजेश शर्मा ने किया।
इस अवसर पर महंत सुंदर दास, महामंडलेश्वर रामस्वरूप ब्रह्मचारी, महंत काकाजी, राधाबल्लभ वशिष्ठ, खेलन बिहारी मुखिया, हरीमोहन पाठक, संजय शर्मा, चोखेलाल, राकेश वर्मा, किशनसिंह वर्मा, विजय कुमार पाठक, सुनील सिंह, संजीव वर्मा, धीरेंद्र पाठक, रवि भदौरिया, सीपी शर्मा, चंद्रप्रकाश तरकर, प्रेमदास, श्यामबिहारी, नंदकिशोर आदि उपस्थित थे।