वृंदावन शोध संस्थान द्वारा आयोजित आठ दिवसीय सांझी महोत्सव के अंतर्गत मंगलवार को सेवाकुंज स्थित ठा. किशोरी रमण मंदिर (बौहरे जी की कुंज) में सांझी पद गायन, सांझी रचना और “ब्रज की सांझी के कला और भाव पक्ष” विषय पर संगोष्ठी का आयोजन हुआ।
आचार्य विभुकृष्ण भट्ट ने कहा कि ब्रज की सांझी परंपरा कला और भाव दोनों धरातलों पर समृद्ध रूप से स्थापित है। इसमें अभिव्यक्त होने वाले श्रीराधाकृष्ण की लीलाओं का अंकन न केवल भाव पक्ष को दर्शाता है बल्कि ज्यामिति और अलंकारिक बेली जैसी कलात्मकता सांझी की मजबूत कला परंपरा का परिचय कराती है।
आचार्य यदुनंदन ने बताया कि पितृ पक्ष के दौरान ब्रजमंडल में सांझी की छटा देखते ही बनती है। वहीं विजयकिशोर मिश्र ने वृंदावन में सांझी की पुरातन परंपरा और इससे जुड़े कलाविदों के योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि संस्थान द्वारा यह आयोजन सांझी परंपरा के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास है।
सेवायत सुमनकांत पालीवाल ने कहा कि बौहरे जी की कुंज, रासलीला अनुकरण और सांझी लीलाओं की प्राचीन परंपरा के लिए विशेष पहचान रखता है।
कार्यक्रम का शुभारंभ सांझी पद गायन से हुआ, जिसमें भुवनेश पाठक ने स्वर दिए। तबला पर मोहनवल्लभ और पखावज पर नीलमाधव ने संगत की। नव्या और आराध्या पालीवाल ने “यमुना किनारा है...” गीत की भावमयी प्रस्तुति देकर वातावरण भक्ति से सराबोर कर दिया।
संगोष्ठी का संयोजन एवं संचालन संस्थान के शोध अधिकारी डॉ. राजेश शर्मा ने किया।
इस अवसर पर महंत गोविंद प्रभु, गोस्वामी छैलबिहारी सिद्ध, सुरेशचंद्र शर्मा, मनीष पालीवाल, महेश भारद्वाज, गिरधारीलाल शर्मा, रासबिहारी दास समेत कई विद्वान, कलाकार और शोधार्थी उपस्थित रहे।