भगवान शिव के भक्त श्रावण मास को अत्यंत महत्व, नियम एवं संयम से मानते है। ऐसी कथा प्रचलित है कि मार्कण्डेय ऋषि ने अपनी अल्पायु से बचने के लिए भगवान शिव का घोर तप श्रावण मास में ही किया था। भगवान शिव प्रसन्न हो गए और ऋषि के प्राण हरने को आए यमराज को भी मार्कण्डेय ऋषि के समक्ष नतमस्तक होना पड़ा था।
भगवान शिव अकेले ऐसे देव हैं, जो किसी में भेद नहीं करते, जब राक्षसों ने घोर तप किया तब उन्हें भी प्रसन्न होकर मान चाहा वरदान दे दिया। यहां तक कि भस्मासुर जिसने वर का प्रयोग स्वयं भोलेनाथ पर ही कर दिया। भगवान भोलेनाथ ही ऐसे देव हैं जो पशुओं को भी स्वीकार करते हैं। इसलिए पशुपतिनाथ के नाम से भी जाने और पूजे जाते हैं।
जल चढ़ाने मात्र से हो जाते हैं संतुष्ट
अन्य सभी देवताओं के पूजन आदि के नियम हैं लेकिन भगवान भोलेनाथ जल चढ़ाने मात्र से भी संतुष्ट हो जाते हैं। भगवान शिव ने रावण से प्रसन्न होकर उसे लंका का राज्य दिया। आज भी लय से शिवतांडव स्त्रोत का पाठ करने से स्थिर सुमिखि लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। भगवान शिव के अभिषेक को गन्ने के रस से करने से सम्पन्नता, दूध से करने से मनोकामना, शहद से करने से आरोग्यता एवं सरसों के तेल से करने से शत्रु का नाश होता है। भगवान शिव प्रसन्न होकर भक्तों को अभीष्ठ वर प्रदान करते हैं तथा भक्तों की पीड़ा को नष्ट कर देते हैं।
भोलेनाथ की कृपा से राहु-शनि की महादशा होती है नष्ट
ऋषि पाराशर के द्वारा यह भी वर्णित है, जो भी राहु-शनि या शनि-राहु अंतर्दशा में भगवान शिव की अर्चना करता है या शनि एवं राहु की महादशा में भगवान शिव की अर्चना करता है उसके बुरे फल स्वतः नष्ट हो जाते हैं या पता ही नहीं चलते। जहां तक कि मारकेश युक्त दशाओं में भगवान शिव के ही महामृतुन्जय मंत्र का जाप करने से इससे बचा जा सकता है। शिव ही कल्याण हैं, जहां वैर भेद नष्ट हो जाएं वहां शिव का वास है। - एस्ट्रो सुमित विजयवर्गीय